श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 56: श्रीराम आदि का चित्रकूट में पहुँचना, वाल्मीकिजी का दर्शन करके श्रीराम की आज्ञा से लक्ष्मणद् वारा पर्णशाला का निर्माण,सबका कुटी में प्रवेश  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  2.56.32 
जपं च न्यायत: कृत्वा स्नात्वा नद्यां यथाविधि।
पापसंशमनं रामश्चकार बलिमुत्तमम्॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
श्री राम ने नदी में विधिपूर्वक स्नान करके गायत्री आदि मन्त्रों का जप करके पंचसूना आदि दोषों की शांति के लिए उत्तम यज्ञ किया॥32॥
 
After taking a ritual bath in the river and chanting Gayatri etc. mantras, Shri Ram performed the best sacrifice for the peace of Panchsuna etc. defects. 32॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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