श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 56: श्रीराम आदि का चित्रकूट में पहुँचना, वाल्मीकिजी का दर्शन करके श्रीराम की आज्ञा से लक्ष्मणद् वारा पर्णशाला का निर्माण,सबका कुटी में प्रवेश  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  2.56.29 
राम: स्नात्वा तु नियतो गुणवाञ्जपकोविद:।
संग्रहेणाकरोत् सर्वान् मन्त्रान् सत्रावसानिकान्॥ २९॥
 
 
अनुवाद
गुणों से सम्पन्न और जप-तप के ज्ञाता श्री रामचन्द्र जी ने स्नान करके शौच और संतोष आदि नियमों का पालन करते हुए उन सब मन्त्रों का संक्षेप में पाठ और जप किया, जो वास्तु यज्ञ को पूर्ण करते हैं॥29॥
 
After taking bath, Shri Ramchandra ji, full of virtues and knowledgeable about chanting, recited and chanted briefly all those mantras, which fulfill the Vaastu Yagya, following the rules of toilet and satisfaction etc. 29॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas