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ramayan 2.55.25: "ताकि हम वन से सकुशल लौट सकें और माता कौशल्या तथा सुमति देवी सुमित्रा के दर्शन कर सकें।" ऐसा कहकर बुद्धिमान सीता ने हाथ जोड़कर वृक्ष की परिक्रमा की।   |   ramayan सर्ग 2.55: श्रीराम आदि का अपने ही बनाये हुए बेडे से यमुनाजी को पार करना, सीता की यमुना और श्यामवट से प्रार्थना,यमुनाजी के समतल तट पर रात्रि में निवास करना   ।   ramayan काण्ड 2: अयोध्या काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 55: श्रीराम आदि का अपने ही बनाये हुए बेडे से यमुनाजी को पार करना, सीता की यमुना और श्यामवट से प्रार्थना,यमुनाजी के समतल तट पर रात्रि में निवास करना  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  2.55.25 
कौसल्यां चैव पश्येम सुमित्रां च यशस्विनीम्।
इति सीताञ्जलिं कृत्वा पर्यगच्छन्मनस्विनी॥ २५॥
 
 
अनुवाद
"ताकि हम वन से सकुशल लौट सकें और माता कौशल्या तथा सुमति देवी सुमित्रा के दर्शन कर सकें।" ऐसा कहकर बुद्धिमान सीता ने हाथ जोड़कर वृक्ष की परिक्रमा की।
 
"So that we may return safely from the forest and have the darshan of mother Kausalya and the glorious Sumitra Devi." Saying thus, the intelligent Sita circumambulated the tree with folded hands.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)