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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 54: लक्ष्मण और सीता सहित श्रीराम का भरद्वाज-आश्रम में जाना, मुनि का उन्हें चित्रकूट पर्वत पर ठहरने का आदेश तथा चित्रकूट की महत्ता एवं शोभा का वर्णन  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  2.54.37 
शर्वरीं भगवन्नद्य सत्यशील तवाश्रमे।
उषिता: स्मोऽह वसतिमनुजानातु नो भवान्॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
'प्रभो! आप स्वभावतः सत्यवादी हैं। आज हमने आपके आश्रम में बहुत सुखपूर्वक रात्रि बिताई है, अब कृपया हमें अपने अगले गंतव्य पर जाने की अनुमति प्रदान करें।'॥37॥
 
‘Lord! You are naturally a truth-teller. Today we have spent the night very comfortably in your ashram, now please grant us permission to proceed to our next destination.'॥ 37॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)