श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 53: श्रीराम का राजा को उपालम्भ देते हुए कैकेयी से कौसल्या आदि के अनिष्ट की आशङ्का बताकर लक्ष्मण को अयोध्या लौटाने के लिये प्रयत्न करना  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  2.53.33 
ततस्तत्र समासीनौ नातिदूरे निरीक्ष्य ताम्।
न्यग्रोधे सुकृतां शय्यां भेजाते धर्मवत्सलौ॥३३॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् वहाँ बैठे हुए धर्मात्मा सीता और श्री रामजी ने थोड़ी ही दूरी पर वट वृक्ष के नीचे लक्ष्मणजी द्वारा सुन्दर बिछाई हुई शय्या देखी और वहीं आश्रय लिया (अर्थात् वे दोनों वहीं जाकर सो गए)॥33॥
 
Thereafter, the virtuous Sita and Shri Ram, sitting there, saw the bed beautifully made by Lakshman under the banyan tree at a short distance and took shelter there (that is, they both went and slept there). 33॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)