श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 53: श्रीराम का राजा को उपालम्भ देते हुए कैकेयी से कौसल्या आदि के अनिष्ट की आशङ्का बताकर लक्ष्मण को अयोध्या लौटाने के लिये प्रयत्न करना  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  2.53.25 
एको ह्यहमयोध्यां च पृथिवीं चापि लक्ष्मण।
तरेयमिषुभि: क्रुद्धो ननु वीर्यमकारणम्॥ २५॥
 
 
अनुवाद
'लक्ष्मण! यदि मैं क्रोधित हो जाऊँ, तो अकेले ही अपने बाणों से अयोध्यापुरी तथा सम्पूर्ण जगत् को निर्विघ्न बनाकर अपने वश में कर सकता हूँ; किन्तु बल और पराक्रम आध्यात्मिक लाभ प्राप्ति का कारण नहीं हैं (इसीलिए मैं ऐसा नहीं कर रहा हूँ।)॥ 25॥
 
'Laxmana! If I become angry, then I can single-handedly make Ayodhyapuri and the entire world free from obstacles with my arrows and take it under my control; but strength and valour are not the reason for achieving spiritual benefits (that is why I am not doing that.)॥ 25॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)