श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 52: श्रीराम की आज्ञा से गुह का नाव मँगाना, श्रीराम का सुमन्त्र को समझाबुझाकर अयोध्यापुरी लौट जाने के लिये आज्ञा देना,सीता की गङ्गाजी से प्रार्थना  »  श्लोक 56
 
 
श्लोक  2.52.56 
वनवासे क्षयं प्राप्ते ममैष हि मनोरथ:।
यदनेन रथेनैव त्वां वहेयं पुरीं पुन:॥ ५६॥
 
 
अनुवाद
'मेरी इच्छा है कि जब वनवास की अवधि समाप्त हो जाए तो मैं आपको इसी रथ पर अयोध्यापुरी ले जाऊं।
 
'It is my desire that when the period of exile is over, I should take you to Ayodhyapuri in this same chariot.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)