श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 51: निषादराज गुह के समक्ष लक्ष्मण का विलाप  »  श्लोक 8-9
 
 
श्लोक  2.51.8-9 
लक्ष्मणस्तु तदोवाच रक्ष्यमाणास्त्वयानघ।
नात्र भीता वयं सर्वे धर्ममेवानुपश्यता॥ ८॥
कथं दाशरथौ भूमौ शयाने सह सीतया।
शक्या निद्रा मया लब्धुं जीवितं वा सुखानि वा॥ ९॥
 
 
अनुवाद
यह सुनकर लक्ष्मण बोले, 'भोले निषादराज! आप धर्म का ध्यान रखते हुए हमारी रक्षा करते हैं, इसलिए इस स्थान पर हम सबको कोई भय नहीं है। फिर भी जब राजा दशरथ के ज्येष्ठ पुत्र सीता के साथ भूमि पर सो रहे हैं, तब मेरे लिए उत्तम शय्या पर सोना, स्वादिष्ट भोजन करके जीवन निर्वाह करना अथवा अन्य सुखों का भोग करना कैसे संभव है?॥ 8-9॥
 
Hearing this, Lakshmana said, 'Innocent Nishadraja! You protect us keeping an eye on Dharma, therefore there is no fear for all of us at this place. Still, when the eldest son of King Dasharath is sleeping on the ground with Sita, then how is it possible for me to sleep on a good bed, eat delicious food to sustain life or enjoy other pleasures?॥ 8-9॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)