श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 50: श्रीराम का शृङ्गवेरपुर में गङ्गा तट पर पहुँचकर रात्रि में निवास, वहाँ निषादराज गुह द्वारा उनका सत्कार  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  2.50.44 
कुशचीराजिनधरं फलमूलाशनं च माम्।
विद्धि प्रणिहितं धर्मे तापसं वनगोचरम्॥ ४४॥
 
 
अनुवाद
मैं मृगछाला और मृगचर्म धारण करके फल-मूल खाता हूँ और धर्म में स्थित होकर तपस्वी वेश में वन में विचरण करता हूँ। इन दिनों तुम मुझे इसी धर्म में स्थित समझो॥ 44॥
 
'Wearing bark and deerskin, I eat fruits and roots, and being established in Dharma, I roam about in the forest in the guise of an ascetic. These days you must consider me to be established in this discipline.॥ 44॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)