श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 50: श्रीराम का शृङ्गवेरपुर में गङ्गा तट पर पहुँचकर रात्रि में निवास, वहाँ निषादराज गुह द्वारा उनका सत्कार  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  2.50.14 
देवदानवगन्धर्वै: किंनरैरुपशोभिताम्।
नागगन्धर्वपत्नीभि: सेवितां सततं शिवाम्॥ १४॥
 
 
अनुवाद
देवता, दानव, गंधर्व और किन्नर शिवस्वरूपा भागीरथी की शोभा बढ़ाते हैं। नागों और गंधर्वों की पत्नियाँ सदैव उसका जल पीती रहती हैं॥14॥
 
Gods, demons, Gandharvas and Kinnars enhance the beauty of Bhagirathi which is the form of Shiva. The wives of the serpents and Gandharvas always drink its water.॥ 14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)