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श्लोक  2.5.8 
स चैनं प्रश्रितं दृष्ट्वा सम्भाष्याभिप्रसाद्य च।
प्रियार्हं हर्षयन् राममित्युवाच पुरोहित:॥ ८॥
 
 
अनुवाद
श्री रामजी मधुर वचन सुनने के योग्य थे। उन्हें इतना विनम्र देखकर पुरोहित ने उन्हें प्रसन्न करने तथा उनका आनन्द बढ़ाने के लिए 'पुत्र!' कहकर पुकारा -॥8॥
 
Shri Ram was worthy of hearing sweet words. Seeing him so humble, the priest called him 'Son!' and said this to please him and increase his joy -॥ 8॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)