श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 48: नगरनिवासिनी स्त्रियों का विलाप करना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  2.48.17 
पादच्छाया सुखं भर्तुस्तादृशस्य महात्मन:।
स हि नाथो जनस्यास्य स गति: स परायणम्॥ १७॥
 
 
अनुवाद
उनके समान महान् आत्मा और गुरु के चरणों की छाया ही हमारे लिए परम सुख है। वे ही हमारे रक्षक, मोक्षदाता और परम शरण हैं॥17॥
 
‘The shadow of the feet of a great soul and master like him is the ultimate pleasure for us. He is our protector, salvation and ultimate refuge.॥ 17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)