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ramayan 2.37.17: 'प्रभु! जब तक आप अपने पिता की आज्ञा का पालन करने के लिए निर्जन वन में जाते हैं, तब तक यह देखकर हमारा जीवन सफल हो जाए।॥17॥   |   ramayan सर्ग 2.37: श्रीराम आदि का वल्कल-वस्त्र-धारण, गुरु वसिष्ठ का कैकेयी को फटकारते हुए सीता के वल्कलधारण का अनौचित्य बताना   ।   ramayan काण्ड 2: अयोध्या काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 37: श्रीराम आदि का वल्कल-वस्त्र-धारण, गुरु वसिष्ठ का कैकेयी को फटकारते हुए सीता के वल्कलधारण का अनौचित्य बताना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  2.37.17 
पितुर्वाक्यानुरोधेन गतस्य विजनं वनम्।
तावद् दर्शनमस्या न: सफलं भवतु प्रभो॥ १७॥
 
 
अनुवाद
'प्रभु! जब तक आप अपने पिता की आज्ञा का पालन करने के लिए निर्जन वन में जाते हैं, तब तक यह देखकर हमारा जीवन सफल हो जाए।॥17॥
 
'Prabhu! As long as you go to the deserted forest to obey your father's orders, let our lives be successful by seeing this.॥ 17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)