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इति सान्त्वैश्च तीक्ष्णैश्च कैकेयीं राजसंसदि।
भूय: संक्षोभयामास सुमन्त्रस्तु कृताञ्जलि:॥ ३६॥
नैव सा क्षुभ्यते देवी न च स्म परिदूयते।
न चास्या मुखवर्णस्य लक्ष्यते विक्रिया तदा॥ ३७॥
अनुवाद
इस प्रकार सुमन्तराम ने राजमहल में हाथ जोड़कर बार-बार सांत्वना और कठोर शब्दों से कैकेयी को रोकने का प्रयत्न किया; परन्तु वह तनिक भी विचलित नहीं हुईं। देवी कैकेयी को न तो क्रोध आया, न दुःख। उस समय उनके मुख के रंग में कोई परिवर्तन नहीं आया।
In this way, Sumantram, with folded hands, repeatedly tried to dissuade Kaikeyi in the royal palace with consoling and harsh words; but she did not budge an inch. Goddess Kaikeyi neither felt angry nor sad. At that time, there was no change in the colour of her face.
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे पञ्चत्रिंश: सर्ग:॥ ३५॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें पैंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३५॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥