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ramayan 2.35.20: एक दिन तुम्हारे पराक्रमी पिता अपनी शय्या पर लेटे हुए थे। उसी समय जृम्भ नामक पक्षी की आवाज़ उनके कानों में पड़ी। वे उसकी आवाज़ का अर्थ समझ गए। इसलिए वे वहीं कई बार हँसे।   |   ramayan सर्ग 2.35: सुमन्त्र के समझाने और फटकारने पर भी कैकेयी का टस-से-मस न होना   ।   ramayan काण्ड 2: अयोध्या काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  2.35.20 
ततो जृम्भस्य शयने विरुताद् भूरिवर्चस:।
पितुस्ते विदितो भाव: स तत्र बहुधाहसत्॥ २०॥
 
 
अनुवाद
एक दिन तुम्हारे पराक्रमी पिता अपनी शय्या पर लेटे हुए थे। उसी समय जृम्भ नामक पक्षी की आवाज़ उनके कानों में पड़ी। वे उसकी आवाज़ का अर्थ समझ गए। इसलिए वे वहीं कई बार हँसे।
 
‘One day your mighty father was lying on his bed. At that time the voice of a bird called Jrimbha reached his ears. He understood the meaning of its voice. Therefore, he laughed several times there.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)