श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 34: सीता और लक्ष्मण सहित श्रीराम का रानियों सहित राजा दशरथ के पास जाकर वनवास के लिये विदा माँगना, राजा का शोक और मूर्छा  »  श्लोक 32-33
 
 
श्लोक  2.34.32-33 
न हि सत्यात्मनस्तात धर्माभिमनसस्तव।
संनिवर्तयितुं बुद्धि: शक्यते रघुनन्दन॥ ३२॥
अद्य त्विदानीं रजनीं पुत्र मा गच्छ सर्वथा।
एकाहं दर्शनेनापि साधु तावच्चराम्यहम्॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
'पुत्र रघुनंदन! आप सत्य और सदाचार के साक्षात स्वरूप हैं। आपके विचारों को बदलना असंभव है; परन्तु एक रात और रुक जाइए। एक रात के लिए अपनी यात्रा पूरी तरह रोक दीजिए। मुझे एक दिन के लिए ही सही, आपके दर्शन का सुख तो मिल ही जाने दीजिए।'
 
‘Son Raghunandan! You are the embodiment of truth and virtue. It is impossible to change your thoughts; but stay for one more night. Stop your journey completely for just one night. Let me enjoy the pleasure of seeing you even for one day.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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