श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 34: सीता और लक्ष्मण सहित श्रीराम का रानियों सहित राजा दशरथ के पास जाकर वनवास के लिये विदा माँगना, राजा का शोक और मूर्छा  »  श्लोक 23-24
 
 
श्लोक  2.34.23-24 
लक्ष्मणं चानुजानीहि सीता चान्वेतु मां वनम्।
कारणैर्बहुभिस्तथ्यैर्वार्यमाणौ न चेच्छत:॥ २३॥
अनुजानीहि सर्वान् न: शोकमुत्सृज्य मानद।
लक्ष्मणं मां च सीतां च प्रजापतिरिवात्मजान्॥ २४॥
 
 
अनुवाद
‘लक्ष्मण को मेरे साथ वन जाने की अनुमति दीजिए। यह भी स्वीकार कीजिए कि सीता भी मेरे साथ वन में जाएँ। मैंने अनेक सत्य कारण बताकर उन दोनों को रोकने का प्रयत्न किया है, परंतु वे यहाँ रहना नहीं चाहते; इसलिए हे पर-सम्मान करने वाले राजन! शोक को त्यागकर हम सबको - मुझे, लक्ष्मण और सीता को - वन में जाने की अनुमति दीजिए, जैसे ब्रह्माजी ने अपने पुत्रों सनकादिकों को तपस्या के लिए वन में जाने की अनुमति दी थी।’॥23-24॥
 
‘Give permission to Lakshmana to go to the forest with me. Also accept that Sita should also go to the forest with me. I have tried to stop both of them by giving many true reasons, but they do not want to stay here; therefore, O king who respects others! Leave the grief aside and give permission to all of us - me, Lakshmana and Sita - to go to the forest in the same way as Brahmaji had given permission to his sons Sanakadikans to go to the forest for penance.'॥ 23-24॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas