श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 33: सीता और लक्ष्मण सहित श्रीराम का दुःखी नगरवासियों के मुख से तरह की बातें सुनते हुए पिता के दर्शन के लिये कैकेयी के महल में जाना  »  श्लोक 24-25
 
 
श्लोक  2.33.24-25 
अस्मत्त्यक्तं प्रपद्यन्तु सेव्यमानं त्यजन्तु च।
तृणमांसफलादानां देशं व्यालमृगद्विजम्॥ २४॥
प्रपद्यतां हि कैकेयी सपुत्रा सह बान्धवै:।
राघवेण वयं सर्वे वने वत्स्याम निर्वृता:॥ २५॥
 
 
अनुवाद
वे सर्प आदि उन स्थानों में चले जाएँ जिन्हें हमने छोड़ दिया है और उन स्थानों को भी छोड़ दें जिनका हम उपयोग करते हैं। यह देश घास खाने वाले पशुओं, मांसाहारी वन्य पशुओं और फल खाने वाले पक्षियों का निवास स्थान बन जाए। यहाँ सर्प, पशु और पक्षी रहने लगें। ऐसी स्थिति में कैकेयी अपने पुत्र और बन्धुओं सहित इसे अपने अधीन कर लें। हम सब लोग श्री रघुनाथजी के साथ वन में बड़े सुख से रहेंगे।॥ 24-25॥
 
‘Those snakes etc. should go to those places which we have left and leave those places which we use. This country should become the abode of grass eating animals, carnivorous wild animals and fruit eating birds. Snakes, animals and birds should start living here. In that condition Kaikeyi should take it under her control along with her son and relatives. We all will live in the forest with Shri Raghunath ji in great happiness.’॥ 24-25॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)