श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 31: श्रीराम और लक्ष्मण का संवाद, श्रीराम की आज्ञा से लक्ष्मण का सुहृदों से पूछकर और दिव्य आयुध लाकर वनगमन के लिये तैयार होना  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  2.31.7 
अनुज्ञातस्तु भवता पूर्वमेव यदस्म्यहम्।
किमिदानीं पुनरपि क्रियते मे निवारणम्॥ ७॥
 
 
अनुवाद
‘भैया! आपने तो मुझे अपने पास रहने की अनुमति दे दी है, फिर इस समय मुझे क्यों रोक रहे हैं?॥7॥
 
‘Brother! You have already given me permission to stay with you, then why are you stopping me at this time?॥ 7॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)