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ramayan 2.31.5: 'तुम्हारे बिना मैं न तो स्वर्ग जाना चाहता हूँ, न अमर होना चाहता हूँ और न ही समस्त लोकों का ऐश्वर्य प्राप्त करना चाहता हूँ।' ॥5॥   |   ramayan सर्ग 2.31: श्रीराम और लक्ष्मण का संवाद, श्रीराम की आज्ञा से लक्ष्मण का सुहृदों से पूछकर और दिव्य आयुध लाकर वनगमन के लिये तैयार होना   ।   ramayan काण्ड 2: अयोध्या काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 31: श्रीराम और लक्ष्मण का संवाद, श्रीराम की आज्ञा से लक्ष्मण का सुहृदों से पूछकर और दिव्य आयुध लाकर वनगमन के लिये तैयार होना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  2.31.5 
न देवलोकाक्रमणं नामरत्वमहं वृणे।
ऐश्वर्यं चापि लोकानां कामये न त्वया विना॥ ५॥
 
 
अनुवाद
'तुम्हारे बिना मैं न तो स्वर्ग जाना चाहता हूँ, न अमर होना चाहता हूँ और न ही समस्त लोकों का ऐश्वर्य प्राप्त करना चाहता हूँ।' ॥5॥
 
'Without you I do not wish to go to heaven, to become immortal or to obtain the prosperity of all the worlds.' ॥ 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)