श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 31: श्रीराम और लक्ष्मण का संवाद, श्रीराम की आज्ञा से लक्ष्मण का सुहृदों से पूछकर और दिव्य आयुध लाकर वनगमन के लिये तैयार होना  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  2.31.24 
कुरुष्व मामनुचरं वैधर्म्यं नेह विद्यते।
कृतार्थोऽहं भविष्यामि तव चार्थ: प्रकल्प्यते॥ २४॥
 
 
अनुवाद
अतः आप मुझे अपना अनुयायी बना लीजिए। इससे धर्म की हानि नहीं होगी। मैं पूर्ण हो जाऊँगा और मेरे द्वारा आपका उद्देश्य भी पूर्ण हो जाएगा॥24॥
 
‘Therefore, please make me your follower. There will be no loss of religion in this. I will be fulfilled and your purpose will also be fulfilled through me.॥ 24॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)