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ramayan 2.31.17: हे रघुकुल को आनन्द देने वाले सुमित्राकुमार, मेरे लिए भी ऐसा ही करो; क्योंकि हमारी माता हमसे वियोग में कभी सुखी नहीं रहेगी (वह सदैव हमारी चिन्ता में खोई रहेगी)॥17॥   |   ramayan सर्ग 2.31: श्रीराम और लक्ष्मण का संवाद, श्रीराम की आज्ञा से लक्ष्मण का सुहृदों से पूछकर और दिव्य आयुध लाकर वनगमन के लिये तैयार होना   ।   ramayan काण्ड 2: अयोध्या काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 31: श्रीराम और लक्ष्मण का संवाद, श्रीराम की आज्ञा से लक्ष्मण का सुहृदों से पूछकर और दिव्य आयुध लाकर वनगमन के लिये तैयार होना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  2.31.17 
एवं कुरुष्व सौमित्रे मत्कृते रघुनन्दन।
अस्माभिर्विप्रहीणाया मातुर्नो न भवेत् सुखम्॥ १७॥
 
 
अनुवाद
हे रघुकुल को आनन्द देने वाले सुमित्राकुमार, मेरे लिए भी ऐसा ही करो; क्योंकि हमारी माता हमसे वियोग में कभी सुखी नहीं रहेगी (वह सदैव हमारी चिन्ता में खोई रहेगी)॥17॥
 
'O Sumitrakumara, who brings joy to the Raghu clan, do the same for me; because our mother, separated from us, will never be happy (she will always be lost in worry about us)'॥ 17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)