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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 30: सीता का वन में चलने के लिये अधिकआग्रह, विलाप और घबराहट देखकर श्रीराम का उन्हें साथ ले चलने की स्वीकृति देना  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  2.30.9 
यस्य पथ्यंचरामात्थ यस्य चार्थेऽवरुध्यसे।
त्वं तस्य भव वश्यश्च विधेयश्च सदानघ॥ ९॥
 
 
अनुवाद
'भोले रघुनन्दन! आप मुझे भरत के मार्ग पर चलने की शिक्षा दे रहे हैं और जिनके कारण आपका राज्याभिषेक रोका गया है, आप सदैव उनके अधीन और आज्ञाकारी बने रहें, मैं नहीं रहूँगा॥9॥
 
'Innocent Raghunandan! You are teaching me to follow the path of Bharat and for whose sake your coronation has been stopped, you should always remain subservient and obedient to him, I will not stay.॥ 9॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)