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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 30: सीता का वन में चलने के लिये अधिकआग्रह, विलाप और घबराहट देखकर श्रीराम का उन्हें साथ ले चलने की स्वीकृति देना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  2.30.5 
किं हि कृत्वा विषण्णस्त्वं कुतो वा भयमस्ति ते।
यत् परित्यक्तुकामस्त्वं मामनन्यपरायणाम्॥ ५॥
 
 
अनुवाद
'तुम किस बात का विचार कर रहे हो जिससे तुम इतने दुःखी हो गए हो अथवा किससे भयभीत हो कि अपनी पत्नी सीता को, जो तुम्हारी एकमात्र आश्रिता है, त्यागना चाहते हो?॥5॥
 
'What are you thinking about that has made you so sad or whom are you afraid of that you want to abandon your wife, Sita, who is your only dependent?॥ 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)