| श्रीमद् वाल्मीकि रामायण » काण्ड 2: अयोध्या काण्ड » सर्ग 30: सीता का वन में चलने के लिये अधिकआग्रह, विलाप और घबराहट देखकर श्रीराम का उन्हें साथ ले चलने की स्वीकृति देना » श्लोक 44-45 |
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| | | | श्लोक 2.30.44-45  | भूषणानि महार्हाणि वरवस्त्राणि यानि च।
रमणीयाश्च ये केचित् क्रीडार्थाश्चाप्युपस्करा:॥ ४४॥
शयनीयानि यानानि मम चान्यानि यानि च।
देहि स्वभृत्यवर्गस्य ब्राह्मणानामनन्तरम्॥ ४५॥ | | | | | | अनुवाद | | आपके पास जो भी बहुमूल्य आभूषण हों, जो भी सुन्दर वस्त्र हों, जो भी सुन्दर वस्तुएं और मनोरंजन की वस्तुएं हों, जो भी सुन्दर शय्याएं, वाहन और अन्य वस्तुएं मेरे और आपके उपयोग में आती हों, उन्हें ब्राह्मणों को दान करने के बाद जो भी बचे, उसे अपने सेवकों में बांट दीजिए। | | | | Whatever precious ornaments you have, whatever fine clothes you have, whatever beautiful objects and articles of entertainment you have, whatever fine beds, vehicles and other things that are used by me and you, whatever remains after donating them to the brahmins, distribute all of them among your servants. | | ✨ ai-generated | | |
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