श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 30: सीता का वन में चलने के लिये अधिकआग्रह, विलाप और घबराहट देखकर श्रीराम का उन्हें साथ ले चलने की स्वीकृति देना  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक  2.30.43 
ब्राह्मणेभ्यश्च रत्नानि भिक्षुकेभ्यश्च भोजनम्।
देहि चाशंसमानेभ्य: संत्वरस्व च मा चिरम्॥ ४३॥
 
 
अनुवाद
ब्राह्मणों को रत्न आदि उत्तम वस्तुएँ दान करो और अन्न मांगने वाले भिखारियों को भोजन दो। शीघ्रता करो, विलम्ब नहीं करना चाहिए। 43॥
 
‘Donate good things like gems to the Brahmins and give food to the beggars who ask for food. Hurry up, there should be no delay. 43॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas