श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 30: सीता का वन में चलने के लिये अधिकआग्रह, विलाप और घबराहट देखकर श्रीराम का उन्हें साथ ले चलने की स्वीकृति देना  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  2.30.42 
आरभस्व शुभश्रोणि वनवासक्षमा: क्रिया:।
नेदानीं त्वदृते सीते स्वर्गोऽपि मम रोचते॥ ४२॥
 
 
अनुवाद
'सुश्रोणि! अब तुम वनवास के योग्य दान आदि कर्म करने लगो। सीता! अब जब तुमने ऐसा दृढ़ निश्चय कर लिया है, तो तुम्हारे बिना स्वर्ग भी मुझे अच्छा नहीं लगता।॥ 42॥
 
‘Sushroni! Now you should start performing charity and other deeds suitable for exile. Sita! Now that you have taken such a firm resolve, even heaven does not appeal to me without you.॥ 42॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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