श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 30: सीता का वन में चलने के लिये अधिकआग्रह, विलाप और घबराहट देखकर श्रीराम का उन्हें साथ ले चलने की स्वीकृति देना  »  श्लोक 36
 
 
श्लोक  2.30.36 
स्वर्गो धनं वा धान्यं वा विद्या पुत्रा: सुखानि च।
गुरुवृत्त्यनुरोधेन न किंचिदपि दुर्लभम्॥ ३६॥
 
 
अनुवाद
गुरुजनों की सेवा करने से स्वर्ग, धन, विद्या, पुत्र और सुख - कुछ भी दुर्लभ नहीं है॥ 36॥
 
‘By following the service of the Gurus, heaven, wealth, knowledge, sons and happiness - nothing is rare.॥ 36॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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