श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 30: सीता का वन में चलने के लिये अधिकआग्रह, विलाप और घबराहट देखकर श्रीराम का उन्हें साथ ले चलने की स्वीकृति देना  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  2.30.35 
न सत्यं दानमानौ वा यज्ञो वाप्याप्तदक्षिणा:।
तथा बलकरा: सीते यथा सेवा पितुर्मता॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
सीता! पिता की सेवा कल्याण का प्रबल साधन मानी गई है। न सत्य, न दान, न आदर, न दक्षिणा सहित यज्ञ भी उसके समान है।
 
Sita! Serving one's father is considered to be a powerful means of achieving welfare. Neither truth, nor charity, nor respect, nor even a sacrifice with sufficient dakshina is like it.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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