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श्लोक 2.30.32  |
एष धर्मश्च सुश्रोणि पितुर्मातुश्च वश्यता।
आज्ञां चाहं व्यतिक्रम्य नाहं जीवितुमुत्सहे॥ ३२॥ |
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| अनुवाद |
| 'सुश्रोणि! पिता और माता की आज्ञा का पालन करना पुत्र का कर्तव्य है, अतः मैं उनकी आज्ञा का उल्लंघन करके जीवित नहीं रह सकता॥ 32॥ |
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| 'Sushroni! It is the duty of a son to obey the orders of his father and mother, therefore I cannot continue living by disobeying their orders.॥ 32॥ |
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