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ramayan 2.30.32: 'सुश्रोणि! पिता और माता की आज्ञा का पालन करना पुत्र का कर्तव्य है, अतः मैं उनकी आज्ञा का उल्लंघन करके जीवित नहीं रह सकता॥ 32॥   |   ramayan सर्ग 2.30: सीता का वन में चलने के लिये अधिकआग्रह, विलाप और घबराहट देखकर श्रीराम का उन्हें साथ ले चलने की स्वीकृति देना   ।   ramayan काण्ड 2: अयोध्या काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 30: सीता का वन में चलने के लिये अधिकआग्रह, विलाप और घबराहट देखकर श्रीराम का उन्हें साथ ले चलने की स्वीकृति देना  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  2.30.32 
एष धर्मश्च सुश्रोणि पितुर्मातुश्च वश्यता।
आज्ञां चाहं व्यतिक्रम्य नाहं जीवितुमुत्सहे॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
'सुश्रोणि! पिता और माता की आज्ञा का पालन करना पुत्र का कर्तव्य है, अतः मैं उनकी आज्ञा का उल्लंघन करके जीवित नहीं रह सकता॥ 32॥
 
'Sushroni! It is the duty of a son to obey the orders of his father and mother, therefore I cannot continue living by disobeying their orders.॥ 32॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)