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ramayan 2.30.31: हे जनकपुत्री! यह किसी भी प्रकार संभव नहीं है कि मैं वन में न जाऊँ; क्योंकि पिता के सत्य वचन मुझे वन की ओर ले जा रहे हैं।   |   ramayan सर्ग 2.30: सीता का वन में चलने के लिये अधिकआग्रह, विलाप और घबराहट देखकर श्रीराम का उन्हें साथ ले चलने की स्वीकृति देना   ।   ramayan काण्ड 2: अयोध्या काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  2.30.31 
न खल्वहं न गच्छेयं वनं जनकनन्दिनि।
वचनं तन्नयति मां पितु: सत्योपबृंहितम्॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
हे जनकपुत्री! यह किसी भी प्रकार संभव नहीं है कि मैं वन में न जाऊँ; क्योंकि पिता के सत्य वचन मुझे वन की ओर ले जा रहे हैं।
 
'O daughter of Janaka! It is not possible in any way that I do not go to the forest; because father's true words are taking me towards the forest.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)