श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 30: सीता का वन में चलने के लिये अधिकआग्रह, विलाप और घबराहट देखकर श्रीराम का उन्हें साथ ले चलने की स्वीकृति देना  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  2.30.3 
किं त्वामन्यत वैदेह: पिता मे मिथिलाधिप:।
राम जामातरं प्राप्य स्त्रियं पुरुषविग्रहम्॥ ३॥
 
 
अनुवाद
'श्रीराम! क्या मेरे पिता मिथिला नरेश विदेहराज जनक ने आपको दामाद के रूप में पाकर कभी यह सोचा था कि आप केवल शरीर से ही पुरुष हैं, कर्म से तो स्त्री हैं?
 
'Shri Ram! Did my father, King of Mithila, Videhraj Janaka, on getting you as his son-in-law, ever think that you are a man only by body; in actions you are a woman?
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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