श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 30: सीता का वन में चलने के लिये अधिकआग्रह, विलाप और घबराहट देखकर श्रीराम का उन्हें साथ ले चलने की स्वीकृति देना  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  2.30.28 
तव सर्वमभिप्रायमविज्ञाय शुभानने।
वासं न रोचयेऽरण्ये शक्तिमानपि रक्षणे॥ २८॥
 
 
अनुवाद
'शुभन्! यद्यपि मैं वन में तुम्हारी रक्षा करने में पूर्णतया समर्थ हूँ, तथापि तुम्हारे हृदय का भाव भलीभाँति समझे बिना तुम्हें वनवासी बनाना मैंने उचित नहीं समझा॥ 28॥
 
'Shubhan! Although I am fully capable of protecting you in the forest, I did not think it right to make you a forest dweller without fully understanding your heart's intentions.॥ 28॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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