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श्लोक 2.30.28  |
तव सर्वमभिप्रायमविज्ञाय शुभानने।
वासं न रोचयेऽरण्ये शक्तिमानपि रक्षणे॥ २८॥ |
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| अनुवाद |
| 'शुभन्! यद्यपि मैं वन में तुम्हारी रक्षा करने में पूर्णतया समर्थ हूँ, तथापि तुम्हारे हृदय का भाव भलीभाँति समझे बिना तुम्हें वनवासी बनाना मैंने उचित नहीं समझा॥ 28॥ |
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| 'Shubhan! Although I am fully capable of protecting you in the forest, I did not think it right to make you a forest dweller without fully understanding your heart's intentions.॥ 28॥ |
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