श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 30: सीता का वन में चलने के लिये अधिकआग्रह, विलाप और घबराहट देखकर श्रीराम का उन्हें साथ ले चलने की स्वीकृति देना  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  2.30.25 
तत्सितामलचन्द्राभं मुखमायतलोचनम्।
पर्यशुष्यत बाष्पेण जलोद्‍धृतमिवाम्बुजम्॥ २५॥
 
 
अनुवाद
उनका सुन्दर मुख, जो विशाल नेत्रों से सुशोभित था और शुद्ध पूर्ण चन्द्रमा के समान चमक रहा था, पीड़ा के कारण उत्पन्न हुई गर्मी से जल से निकाले गए कमल के समान सूख गया था।
 
His beautiful face, adorned with large eyes and radiant like the pure full moon, had become dry like a lotus taken out of water due to the heat caused by agony. 25.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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