श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 30: सीता का वन में चलने के लिये अधिकआग्रह, विलाप और घबराहट देखकर श्रीराम का उन्हें साथ ले चलने की स्वीकृति देना  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  2.30.21 
इमं हि सहितुं शोकं मुहूर्तमपि नोत्सहे।
किं पुनर्दश वर्षाणि त्रीणि चैकं च दु:खिता॥ २१॥
 
 
अनुवाद
'मैं तुम्हारे वियोग का यह दुःख दो क्षण भी सहन नहीं कर सकूँगा। फिर मैं दुःखी होकर चौदह वर्ष तक इसे कैसे सहन कर सकूँगा?'॥21॥
 
'I will not be able to bear this sorrow of your separation even for two moments. Then how will I, the sad one, bear this for fourteen years?'॥ 21॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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