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श्लोक 2.30.21  |
इमं हि सहितुं शोकं मुहूर्तमपि नोत्सहे।
किं पुनर्दश वर्षाणि त्रीणि चैकं च दु:खिता॥ २१॥ |
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| अनुवाद |
| 'मैं तुम्हारे वियोग का यह दुःख दो क्षण भी सहन नहीं कर सकूँगा। फिर मैं दुःखी होकर चौदह वर्ष तक इसे कैसे सहन कर सकूँगा?'॥21॥ |
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| 'I will not be able to bear this sorrow of your separation even for two moments. Then how will I, the sad one, bear this for fourteen years?'॥ 21॥ |
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