श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 30: सीता का वन में चलने के लिये अधिकआग्रह, विलाप और घबराहट देखकर श्रीराम का उन्हें साथ ले चलने की स्वीकृति देना  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  2.30.12 
कुशकाशशरेषीका ये च कण्टकिनो द्रुमा:।
तूलाजिनसमस्पर्शा मार्गे मम सह त्वया॥ १२॥
 
 
अनुवाद
'मार्ग में मुझे जो कुश, सरकंडे, कांटे और कंटीले वृक्ष मिलेंगे, उनका स्पर्श मुझे आपके साथ रहने के कारण कपास और मृगचर्म के समान सुखदायी लगेगा।
 
'The touch of the Kush-Kaas, reeds, thorns and thorny trees that I will come across on the way will seem as pleasant to me as cotton and deerskin because of your presence in my company.
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas