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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 30: सीता का वन में चलने के लिये अधिकआग्रह, विलाप और घबराहट देखकर श्रीराम का उन्हें साथ ले चलने की स्वीकृति देना  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  2.30.11 
न च मे भविता तत्र कश्चित् पथि परिश्रम:।
पृष्ठतस्तव गच्छन्त्या विहारशयनेष्विव॥ ११॥
 
 
अनुवाद
'जिस प्रकार बगीचे में घूमने या बिस्तर पर सोने में कोई कठिनाई नहीं होती, उसी प्रकार वन-पथ पर आपके पीछे चलने में भी मुझे कोई कष्ट नहीं लगेगा।
 
‘Just as there is no difficulty in walking in the garden or sleeping on the bed, similarly it will not seem like any effort to me to follow you on the forest path.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)