श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 28: श्रीराम का वनवास के कष्ट का वर्णन करते हुए सीता को वहाँ चलने से मना करना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  2.28.5 
सीते विमुच्यतामेषा वनवासकृता मति:।
बहुदोषं हि कान्तारं वनमित्यभिधीयते॥ ५॥
 
 
अनुवाद
'सीते! वनवास जाने का विचार त्याग दो। वन दुर्गम और अनेक दोषों से युक्त कहा गया है।॥5॥
 
'Sita! Give up this idea of ​​going into exile. The forest is said to be inaccessible and full of many defects. ॥ 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)