vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Apps
About
Contact
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण
»
काण्ड 2: अयोध्या काण्ड
»
सर्ग 28: श्रीराम का वनवास के कष्ट का वर्णन करते हुए सीता को वहाँ चलने से मना करना
»
श्लोक 5
श्लोक
2.28.5
सीते विमुच्यतामेषा वनवासकृता मति:।
बहुदोषं हि कान्तारं वनमित्यभिधीयते॥ ५॥
अनुवाद
'सीते! वनवास जाने का विचार त्याग दो। वन दुर्गम और अनेक दोषों से युक्त कहा गया है।॥5॥
'Sita! Give up this idea of going into exile. The forest is said to be inaccessible and full of many defects. ॥ 5॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
About Us
|
Contact Us
|
Privacy Policy
|
Connect Form
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×