श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 28: श्रीराम का वनवास के कष्ट का वर्णन करते हुए सीता को वहाँ चलने से मना करना  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  2.28.20 
नदीनिलयना: सर्पा नदीकुटिलगामिन:।
तिष्ठन्त्यावृत्य पन्थानमतो दु:खतरं वनम्॥ २०॥
 
 
अनुवाद
'नदियों में रहने वाले और नदियों के समान टेढ़े-मेढ़े चलने वाले सर्प, वन के मार्गों को घेरकर बहुत संख्या में रहते हैं; इसलिए वह वन बड़ा कष्टदायक है॥ 20॥
 
'Serpents who live in rivers and move in the same crooked manner as the rivers, lie in large numbers surrounding the paths in the forest; therefore the forest is very troublesome.॥ 20॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)