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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 26: श्रीराम को उदास देखकर सीता का उनसे इसका कारण पूछना और श्रीराम का वन में जाने का निश्चय बताते हुए सीता को घर में रहने के लिये समझाना  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  2.26.32 
वन्दितव्याश्च ते नित्यं या: शेषा मम मातर:।
स्नेहप्रणयसम्भोगै: समा हि मम मातर:॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
'तुम्हें मेरी शेष माताओं के चरणों में भी प्रतिदिन प्रणाम करना चाहिए, क्योंकि स्नेह, अपार प्रेम और पालन-पोषण की दृष्टि से सभी माताएँ मेरे लिए समान हैं।
 
'You should also bow down to the feet of my remaining mothers every day, because all mothers are equal to me in terms of affection, great love and upbringing.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)