श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 26: श्रीराम को उदास देखकर सीता का उनसे इसका कारण पूछना और श्रीराम का वन में जाने का निश्चय बताते हुए सीता को घर में रहने के लिये समझाना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  2.26.17 
न च काञ्चनचित्रं ते पश्यामि प्रियदर्शन।
भद्रासनं पुरस्कृत्य यान्तं वीर पुर:सरम्॥ १७॥
 
 
अनुवाद
'प्रियदर्शन वीर! आज वह प्रधान सेवक आपके सुवर्णमय भद्रासन को हाथों में आदरपूर्वक धारण करता हुआ आगे-आगे क्यों नहीं जाता?॥17॥
 
'Priyadarshan Veer! Why is the leading servant not seen going ahead today, respectfully holding your golden Bhadraasan in his hands?॥ 17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)