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ramayan 2.24.37: 'बेटा! क्या अब वह समय आ सकता है, जब मैं तुम्हें जटाधारी और छालधारी, वन से लौटते हुए पुनः देख सकूँगा?'॥37॥   |   ramayan सर्ग 2.24: कौसल्या का श्रीराम से अपने को भी साथ ले चलने के लिये आग्रह करना , श्रीराम का उन्हें रोकना और वन जाने के लिये उनकी अनुमति प्राप्त करना   ।   ramayan काण्ड 2: अयोध्या काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 24: कौसल्या का श्रीराम से अपने को भी साथ ले चलने के लिये आग्रह करना , श्रीराम का उन्हें रोकना और वन जाने के लिये उनकी अनुमति प्राप्त करना  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  2.24.37 
अपीदानीं स काल: स्याद् वनात् प्रत्यागतं पुन:।
यत् त्वां पुत्रक पश्येयं जटावल्कलधारिणम्॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
'बेटा! क्या अब वह समय आ सकता है, जब मैं तुम्हें जटाधारी और छालधारी, वन से लौटते हुए पुनः देख सकूँगा?'॥37॥
 
'Son! Can that time come now when I will be able to see you again, wearing matted hair and bark, returning from the forest?'॥ 37॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)