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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 24: कौसल्या का श्रीराम से अपने को भी साथ ले चलने के लिये आग्रह करना , श्रीराम का उन्हें रोकना और वन जाने के लिये उनकी अनुमति प्राप्त करना  »  श्लोक 33-34h
 
 
श्लोक  2.24.33-34h 
गच्छ पुत्र त्वमेकाग्रो भद्रं तेऽस्तु सदा विभो॥ ३३॥
पुनस्त्वयि निवृत्ते तु भविष्यामि गतक्लमा।
 
 
अनुवाद
'शक्तिशाली पुत्र! अब तुम निश्चिंत होकर वन में जाओ, तुम्हारा सदैव कल्याण हो। जब तुम वन से लौटोगे, उस समय मेरे सारे दुःख-दर्द दूर हो जाएँगे।'
 
'Powerful son! Now you go to the forest without worry, may you always be blessed. When you return from the forest, at that time all my pain and sorrow will go away. 33 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)