श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 24: कौसल्या का श्रीराम से अपने को भी साथ ले चलने के लिये आग्रह करना , श्रीराम का उन्हें रोकना और वन जाने के लिये उनकी अनुमति प्राप्त करना  »  श्लोक 25-26h
 
 
श्लोक  2.24.25-26h 
व्रतोपवासनिरता या नारी परमोत्तमा॥ २५॥
भर्तारं नानुवर्तेत सा च पापगतिर्भवेत्।
 
 
अनुवाद
‘जो स्त्री उत्तम गुणों और वर्ण में श्रेष्ठ होने पर भी तथा व्रत में तत्पर रहने पर भी अपने पति की सेवा नहीं करती, वह पापियों को मिलने वाले दण्ड (नरक आदि) को प्राप्त होती है। 25 1/2॥
 
‘The woman who does not serve her husband despite being the best in terms of excellent qualities and caste and being diligent in fasting, gets the punishment (hell etc.) given to sinners. 25 1/2॥
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