श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 24: कौसल्या का श्रीराम से अपने को भी साथ ले चलने के लिये आग्रह करना , श्रीराम का उन्हें रोकना और वन जाने के लिये उनकी अनुमति प्राप्त करना  »  श्लोक 24-25h
 
 
श्लोक  2.24.24-25h 
दारुणश्चाप्ययं शोको यथैनं न विनाशयेत्॥ २४॥
राज्ञो वृद्धस्य सततं हितं चर समाहिता।
 
 
अनुवाद
'कदाचित् यह घोर दुःख उनके जीवन का अन्त कर दे। तुम सदैव सावधान रहो और यथासम्भव वृद्ध महाराज के कल्याण में लगे रहो।॥24 1/2॥
 
‘It may happen that this terrible grief ends his life. You should always remain cautious and keep engaged in the welfare of the old Maharaja in whatever way possible.॥ 24 1/2॥
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