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ramayan 2.24.19-20h: 'पुत्र राम! मैं अब इन सहस्त्रियों के साथ नहीं रह सकता। हे ककुत्स्थ! यदि आपने पिता की आज्ञा का पालन करने के लिए वन में जाने का निश्चय किया है, तो वन में रहने वाले मृग की भाँति मुझे भी वन में ले चलो।'॥19 1/2॥   |   ramayan सर्ग 2.24: कौसल्या का श्रीराम से अपने को भी साथ ले चलने के लिये आग्रह करना , श्रीराम का उन्हें रोकना और वन जाने के लिये उनकी अनुमति प्राप्त करना   ।   ramayan काण्ड 2: अयोध्या काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 24: कौसल्या का श्रीराम से अपने को भी साथ ले चलने के लिये आग्रह करना , श्रीराम का उन्हें रोकना और वन जाने के लिये उनकी अनुमति प्राप्त करना  »  श्लोक 19-20h
 
 
श्लोक  2.24.19-20h 
आसां राम सपत्नीनां वस्तुं मध्ये न मे क्षमम्।
नय मामपि काकुत्स्थ वनं वन्यां मृगीमिव॥ १९॥
यदि ते गमने बुद्धि: कृता पितरपेक्षया।
 
 
अनुवाद
'पुत्र राम! मैं अब इन सहस्त्रियों के साथ नहीं रह सकता। हे ककुत्स्थ! यदि आपने पिता की आज्ञा का पालन करने के लिए वन में जाने का निश्चय किया है, तो वन में रहने वाले मृग की भाँति मुझे भी वन में ले चलो।'॥19 1/2॥
 
'Son Rama! I cannot live with these co-wives anymore. O Kakutstha! If you have decided to go to the forest to obey your father's orders, then take me to the forest like a deer living in the forest.'॥19 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)