श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 23: लक्ष्मण की ओज भरी बातें, उनके द्वारा दैव का खण्डन और पुरुषार्थ का प्रतिपादन  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  2.23.9 
तयो: सुचरितं स्वार्थं शाठॺात् परिजिहीर्षतो:।
यदि नैवं व्यवसितं स्याद्धि प्रागेव राघव।
तयो: प्रागेव दत्तश्च स्याद् वर: प्रकृतश्च स:॥ ९॥
 
 
अनुवाद
'रघुनंदन! ये दोनों अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए धर्म के नाम पर आप जैसे सच्चरित्र पुरुष का परित्याग करना चाहते हैं। यदि उन्होंने ऐसा न सोचा होता, तो आज जो कार्य हुआ है, वह पहले ही हो गया होता। यदि वरदान सच्चा होता, तो आपके अभिषेक का कार्य आरम्भ होने से पहले ही ऐसा वरदान दे दिया गया होता॥9॥
 
‘Raghunandan! Both of them want to abandon a man of good character like you in the name of religion in order to fulfil their selfish motives. If they had not thought so, then the work that has happened today would have been done earlier. If the boon was true, then such a boon would have been given before the work of your consecration started.॥ 9॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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