श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 23: लक्ष्मण की ओज भरी बातें, उनके द्वारा दैव का खण्डन और पुरुषार्थ का प्रतिपादन  »  श्लोक 4-5h
 
 
श्लोक  2.23.4-5h 
अग्रहस्तं विधुन्वंस्तु हस्ती हस्तमिवात्मन:।
तिर्यगूर्ध्वं शरीरे च पातयित्वा शिरोधराम्॥ ४॥
अग्राक्ष्णा वीक्षमाणस्तु तिर्यग्भ्रातरमब्रवीत्।
 
 
अनुवाद
जैसे हाथी अपनी सूँड़ हिलाता है, उसी प्रकार अपना दाहिना हाथ हिलाते हुए और गर्दन को ऊपर-नीचे तथा इधर-उधर हिलाते हुए, नेत्रों के सामने से टेढ़ी दृष्टि से अपने भाई राम की ओर देखकर उनसे बोले - ॥4 1/2॥
 
Just as an elephant shakes its trunk, in the same way shaking his right hand and moving his neck up and down and from side to side, looking at his brother Rama with a crooked glance from the front of his eyes, he said to him - ॥ 4 1/2 ॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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