श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 23: लक्ष्मण की ओज भरी बातें, उनके द्वारा दैव का खण्डन और पुरुषार्थ का प्रतिपादन  »  श्लोक 38-39
 
 
श्लोक  2.23.38-39 
अद्य चन्दनसारस्य केयूरामोक्षणस्य च।
वसूनां च विमोक्षस्य सुहृदां पालनस्य च॥ ३८॥
अनुरूपाविमौ बाहू राम कर्म करिष्यत:।
अभिषेचनविघ्नस्य कर्तॄणां ते निवारणे॥ ३९॥
 
 
अनुवाद
'श्रीराम! आज मेरी ये दोनों भुजाएँ, जो चन्दन लगाने, बाजूबंद पहनने, धन दान करने और मित्रों की सेवा में तत्पर रहने में समर्थ हैं, आपके राज्याभिषेक में विघ्न डालने वालों को रोकने के लिए अपना यथोचित पराक्रम दिखाएँगी॥ 38-39॥
 
'Shri Ram! Today these two arms of mine, which are capable of applying sandalwood paste, wearing armlets, donating wealth and being engaged in the care of friends, will display their appropriate valour to stop those who create obstacles in your coronation.॥ 38-39॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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