श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 23: लक्ष्मण की ओज भरी बातें, उनके द्वारा दैव का खण्डन और पुरुषार्थ का प्रतिपादन  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  2.23.30 
न शोभार्थाविमौ बाहू न धनुर्भूषणाय मे।
नासिराबन्धनार्थाय न शरा: स्तम्भहेतव:॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
मेरी ये दोनों भुजाएँ केवल दिखावे के लिए नहीं हैं। ये मेरे इस धनुष के लिए आभूषण नहीं बनेंगी। यह तलवार केवल कमर में बाँधने के लिए नहीं है और ये बाणों के लिए स्तंभ नहीं बनेंगी।॥30॥
 
‘These two arms of mine are not for show only. They will not become ornaments for this bow of mine. This sword is not meant to be tied around the waist only and these will not become pillars for arrows.॥ 30॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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